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अंशु शिवेन्द्र (डिम्पू) की स्मृति में

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इस अंक का संपादन... अनवर सुहैल    र.नं.63166/78 प्रकाशन का पैंतीसवां वर्ष   अर्धवार्षिक प्रकाशन          स्मृति अंक समय पर समय की बात  जुलाई- दिसंबर 2015  अंशु शिवेन्द्र पर केन्द्रित  स्मृति अंक अंशु शिवेन्द्र (डिम्पू) की स्मृति में आविर्भाव.. 26 जनवरी 1977 निर्वाण....2 जून 2014 रचना क्रम.....      संपादकीय धन्ये, मैं पिता निरर्थक था कुछ भी तेरे हित न कर सका! ‘सरोज-स्मृति’ 1935 ई. में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित लम्बी कविता और एक शोकगीत है। निराला ने यह कविता अपनी अठारह वर्षीय पुत्री सरोज के निधन के उपरांत लिखी थी। इस कविता मंे उन्होंने शोक के साथ-साथ समाज के प्रति आक्रोश और व्यंग्य प्रकट किया है। यह कविता हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ शोकगीतों में से एक मानी जाती है। इस कविता की तुलना रामविलास शर्मा ने शेक्सपीयर की किंग लियर से करते हुए लिखा था--‘हिन्दी ही में नहीं अंग्रेजी में भी ऐसे शोकगीत दुर्लभ हैं।’  अग्रज रामनाथ शिवेन्द्र ने पुत्र-शोक में जो कविताएं और लेख-संस्मरणादि लिखे है...

दूसरी आजादी

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दूसरी आजादी (रामनाथ शिवेन्द्र) उपन्यास का अंश      कुछ अपनी बातें...   दूसरी  आजादी् का कथानक उन हसीन सपनों से उपजा है, जो सन् १८५७ से लेकर १९४७ ई० तक लगातार अंखुआते रहे हैं। आजादी मिलते ही हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, सभी को रोटी और मकान मिल जाएगा, पर सपना तो सपना वह भला कैसे जमीन पर उतरे। आजादी के समय और काफी बाद तक सोनभद्र श्मीरजापुर् जनपद का एक भूभाग रहा है, जिसे कैमूर का दक्षिणांचल कहा जाता रहा है। अंग्रेजों के समय यह हिस्सा अनुसूचित हिस्सा था, जहां केवल फौजदारी के कानून लागू थे तथा राजस्व और दीवानी के कानून यहां की परम्पराओं पर आधारित थे। आजादी मिलते ही यहां के पारम्परिक कानूनों को समाप्त कर दिया गया। अब तो श्सोनभद्र् एक अलग जनपद है, जहां सारे कायदे कानून लागू है। तमाम औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, ऊंची-ऊंची चिमनियां हैं तो लाखों की संख्या में विस्थापित भी है। इनके अलावा कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी हैं तथा बाकियों के परिजन भी हैं। उनसे मिल कर आजादी की जो तस्वीर उभरती है तथा दूसरी आजादी तक का चित्र प्रस्तुत करती है वही दूसरी आजादी उपन्...